APNIDIARY / STORY

चाय का दूसरा कप

By Apni Diary  ·  September 19, 2026
हमारे मोहल्ले में चाय हमेशा दो कप बनती थी। एक अब्बा के लिए और एक अम्मी के लिए। बाक़ी लोगों की चाय का कोई हिसाब नहीं था। कोई आ गया तो तीसरा बन गया, कोई चला गया तो आधा कप सिंक में पड़ा रह गया। मगर अम्मी की चाय के साथ एक अजीब क़ायदा था—वह हमेशा दो कप बनाती थीं। एक उनके लिए। दूसरा... किसी के लिए नहीं। कम-से-कम घर में यही कहा जाता था। सामने वाले मकान में रज़िया रहती थी। रज़िया आपा। विधवा थीं। उम्र कोई पैंतीस-छत्तीस की होगी। सुबह आँगन में पानी का छिड़काव करतीं तो उनकी चूड़ियों की आवाज़ हमारी रसोई तक आती थी। दोपहर को सिलाई मशीन चलती रहती और शाम को छत पर कपड़े उतारते हुए वह हमेशा आसमान को कुछ देर ज़्यादा देखतीं। अम्मी उनसे बहुत कम बातें करती थीं। लेकिन जब भी रज़िया आपा हमारे घर आतीं, अम्मी की आवाज़ बदल जाती। “बैठो।” बस इतना। और फिर चाय बनती। दो कप। मैं बचपन में समझता था कि अम्मी को शायद गिनती नहीं आती। एक दिन मैंने पूछा भी— “अम्मी, आप दो कप क्यों बनाती हो?” उन्होंने चम्मच कप में घुमाते हुए कहा— “एक आदत है।” “किसकी?” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर हँस दीं। “तुम्हें हर बात जाननी ज़रूरी है क्या?” मुझे लगा बात ख़त्म। मगर बात वहीं से शुरू हुई थी। रज़िया आपा जब आतीं तो अम्मी उनके लिए हमेशा वही नीली प्याली निकालतीं। घर में बहुत प्यालियाँ थीं। लाल फूलों वाली। हरे किनारे वाली। एक ऐसी भी जिसमें किनारे से बाल बराबर दरार थी। मगर नीली प्याली सिर्फ़ रज़िया आपा की थी। किसी और के हाथ में वह प्याली मैंने कभी नहीं देखी। एक दिन वह प्याली टूट गई। रसोई में आवाज़ हुई। मैं दौड़कर पहुँचा। अम्मी फर्श पर बैठी थीं। उनकी हथेली में नीली प्याली के दो टुकड़े थे। अजीब बात यह थी कि प्याली टूटने पर वह रो नहीं रही थीं। बस उसे देख रही थीं। बहुत देर तक। फिर उन्होंने धीरे से कहा— “अब दूसरी लेनी पड़ेगी।” उस शाम रज़िया आपा आईं। अम्मी ने चाय बनाई। दो कप। लेकिन नीली प्याली नहीं थी। रज़िया आपा ने कप हाथ में लिया, मगर पीया नहीं। “टूट गई?” अम्मी ने सिर हिला दिया। कुछ देर दोनों चुप रहीं। फिर रज़िया आपा ने कहा— “अच्छा हुआ।” अम्मी ने उनकी तरफ़ देखा। “क्यों?” “बहुत पुरानी हो गई थी।” अम्मी मुस्कुराईं। “इतनी भी नहीं।” रज़िया आपा ने कप नीचे रख दिया। “कुछ चीज़ें पुरानी होकर ही अच्छी लगती हैं।” अम्मी ने जवाब नहीं दिया। मगर उस दिन चाय ठंडी हो गई। दोनों ने नहीं पी। मोहल्ले में लोगों को बहुत कुछ दिखाई देता था। बस वही नहीं दिखाई देता था जो सामने था। उन्हें मालूम था कि रज़िया आपा रोज़ शाम हमारे घर आती हैं। उन्हें मालूम था कि अम्मी उनके जाने के बाद दरवाज़े तक जाती हैं। उन्हें यह भी मालूम था कि रज़िया आपा कभी अपने घर से छाता लेकर नहीं आतीं, मगर बारिश में लौटते समय हमारे घर का पुराना काला छाता उनके हाथ में होता है। लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि वह छाता हर बार अगले दिन सुबह हमारी खिड़की के पास कैसे आ जाता है। कुछ चीज़ों को नाम दे दिया जाए तो वे गुनाह बन जाती हैं। नाम न दिया जाए तो वही चीज़ रोज़मर्रा की आदत लगती है। एक बरसात की रात बिजली चली गई। पूरा मोहल्ला अँधेरे में था। मैं छत पर मोमबत्ती ढूँढ़ने गया तो नीचे आँगन में दो परछाइयाँ दिखाई दीं। अम्मी। और रज़िया आपा। दोनों चारपाई के पास बैठी थीं। अम्मी के हाथ में लालटेन थी। रज़िया आपा के बाल खुले थे। इतने पास कि उनके साये अलग-अलग नहीं लग रहे थे। मैं सीढ़ियों पर रुक गया। अम्मी कुछ कह रही थीं। आवाज़ इतनी धीमी थी कि शब्द सुनाई नहीं दे रहे थे। फिर रज़िया आपा हँसीं। अम्मी ने शायद उन्हें डाँटा। फिर दोनों हँसने लगीं। मैंने पहली बार अम्मी को उस तरह हँसते देखा था। जैसे वह मेरी अम्मी नहीं थीं। जैसे वह बस कोई और थीं। कोई ऐसी औरत जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं था। अचानक रज़िया आपा ने उनका हाथ पकड़ लिया। बहुत देर के लिए नहीं। बस उतनी देर के लिए जितनी देर में लालटेन की लौ काँपकर सीधी हुई। अम्मी ने हाथ नहीं छुड़ाया। मैं वापस सीढ़ियों पर बैठ गया। उस रात मुझे मोमबत्ती की ज़रूरत नहीं पड़ी। अगली सुबह रज़िया आपा अपने घर के बाहर खड़ी थीं। उनके हाथ में वही काला छाता था। अम्मी दरवाज़े पर खड़ी थीं। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। बस देखा। फिर रज़िया आपा चली गईं। अम्मी बहुत देर तक वहीं खड़ी रहीं। मैंने पूछा— “अम्मी, आप उन्हें रोकती क्यों नहीं?” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “किसे?” “रज़िया आपा को।” वह कुछ पल चुप रहीं। फिर बोलीं— “हर जाने वाला वापस नहीं आता।” मैंने पूछा— “तो क्या करें?” उन्होंने रसोई की तरफ़ देखा। “चाय बना लें।” उस दिन मैंने पहली बार देखा— अम्मी ने सिर्फ़ एक कप निकाला। मैंने पूछा— “आज दूसरा कप नहीं?” उन्होंने कहा— “नहीं।” शाम हो गई। रात हो गई। रज़िया आपा नहीं आईं। अम्मी ने खाना भी कम खाया। अगली सुबह दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैं दौड़कर खोलने गया। रज़िया आपा खड़ी थीं। भीगी हुई। हाथ में वही नीली प्याली। मैंने उन्हें देखते ही पीछे हटकर अम्मी को आवाज़ दी। अम्मी बाहर आईं। नीली प्याली उनके हाथ में देखते ही कुछ नहीं बोलीं। रज़िया आपा ने बस इतना कहा— “दूसरी ले आई।” अम्मी ने प्याली ले ली। उनकी उँगलियाँ रज़िया आपा की उँगलियों से छू गईं। इस बार दोनों ने हाथ नहीं हटाया। रसोई में जाकर अम्मी ने चाय चढ़ाई। मैं दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा। थोड़ी देर बाद चम्मच की आवाज़ आई। कप रखे जाने की आवाज़ आई। फिर दूसरी कप की। और मुझे समझ आ गया— कुछ रिश्ते घर के दरवाज़े से नहीं आते। वे रोज़ की छोटी-छोटी चीज़ों में छिपे रहते हैं। एक प्याली में। एक छाते में। एक देर तक पकड़े हुए हाथ में। और कभी-कभी... चाय के दूसरे कप में।

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