APNIDIARY / STORY

बिन ब्याही रुख़सती

By Apni Diary · September 22, 2026
आँगन के उस सीलन भरे कोने में रखा लकड़ी का पुराना अड़्डा आज फिर कस दिया गया था। उस पर लाल सुर्ख़ रेशम का कपड़ा ऐसे तना हुआ था जैसे किसी बेबस की चमड़ी खींच दी गई हो। अम्माँ की धुँधलाई हुई आँखों में आज एक अजीब सी चमक थी। उनके काँपते हाथों ने सुई में सुनहरा तार पिरोया और लाल रेशम पर पहला टाँका ऐसे लगाया, जैसे अपनी रुकी हुई साँसों को ज़िंदगी से बाँध रही हों। सकीना बाजी अपने मैले और घिसे हुए दुपट्टे से पसीना पोंछती हुई पास ही बैठी थीं। उनकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे उस लाल रेशम की चमक के आगे और भी गहरे लग रहे थे। मोहल्ले की औरतों का कानाफूसी का दौर शुरू हो चुका था। “अरी सुनती है, अब के तो लाल जोड़े पर सलमे-सितारे का काम हो रहा है। लग रहा है कि कोई बात पक्की हो गई है।” पड़ोसन ख़ाला ने पान की पीक थूकते हुए एक तीर छोड़ा। अम्माँ ने सुना और अनसुना कर दिया। उनके होठों पर एक थकी हुई मुस्कान तैर गई। पिछले पाँच सालों से इस अड़्डे पर ना जाने कितने ही लाल जोड़े तने और खिंचे थे, लेकिन वो सब दूसरों की बेटियों के लिए थे। उन जोड़ों की सिलाई से जो चंद रुपये आते, वो सकीना बाजी के जहेज़ के लिए उस टीन के टूटे बक्से में जमा हो जाते, जिस पर अब जंग लग चुका था। पर आज, आज का रेशम दूसरों के लिए नहीं था। बात दरअसल यह थी कि दूर के एक ख़ालू का बेटा, रज़ा, शहर में वकालत की पढ़ाई के लिए आने वाला था। अम्माँ ने आसमान की तरफ देखकर जैसे अल्लाह से कोई मूक सौदा कर लिया था। रज़ा के आने की ख़बर से ही घर की दरकती दीवारों पर जैसे सफेदी पोत दी गई। बरसों से सँभाल कर रखे गए तांबे के बर्तन रातों-रात चमका दिए गए। और सकीना बाजी? वो तो जैसे किसी अनदेखे सुहाग के नशे में चूर हो गईं। रज़ा भाई आए तो घर का नक्शा ही बदल गया। उनके लिए बैठक का इकलौता हवादर कमरा खाली कर दिया गया। मैं, जो अपनी किताबों में खोई रहती थी, चुपचाप इस तमाशे को देखती। रज़ा भाई गठीले बदन और रौबदार आवाज़ वाले इंसान थे। उनकी फरमाइशें कभी खत्म नहीं होती थीं। “अम्माँ, आज ज़रा शाम को मुर्ग़ का सालन हो जाए, पढ़ाई कर-कर के दिमाग सूख गया है।” रज़ा भाई हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहते। और सकीना बाजी, जिन्होंने खुद हफ्तों से सिर्फ सूखी रोटी और प्याज़ से पेट भरा था, झट से उठकर बाज़ार की तरफ दौड़ने वाले छोटे भाई के हाथ में अपने बचे-खुचे पैसे थमा देतीं। चूल्हे की आँच में उनका साँवला रंग और झुलसने लगा था। लकड़ियों के धुएँ ने उनकी आँखों में एक स्थायी लाली भर दी थी, पर उन्हें कोई शिकायत नहीं थी। वो रज़ा के मैले और पसीने से बदबू करते कपड़ों को ऐसे धोतीं, जैसे वो कोई मुकद्दस इबादत हो। उनके पाजामों पर इस्त्री करते वक्त सकीना बाजी के हाथों पर कई बार छाले पड़े, पर उनके होठों की वो दबी-दबी सी मुस्कान कभी नहीं मिटी। मैं यह सब देखकर जल-भुन जाती। “बाजी, तुम क्यों इस नवाबज़ादे की गुलामी में लगी हो? क्या तुम्हारे हाथों की कोई कीमत नहीं?” मैंने एक दिन झल्ला कर कह ही दिया। “चुप कर पगली! मेहमान अल्लाह का रूप होते हैं।” उन्होंने मेरी बात टाल दी, पर उनकी आँखें उस लाल रेशम के जोड़े की तरफ उठ गईं, जिस पर अब ज़री की बेलें चढ़ने लगी थीं। अम्माँ रात-रात भर जागकर उस जोड़े में तारे टाँक रही थीं। उन्हें यकीन था कि रज़ा की पढ़ाई पूरी होते ही वो सकीना का हाथ माँग लेगा। आख़िर कौन ऐसा होगा जो इस कदर सेवा और जफाकशी के बाद भी पिघल ना जाए? लेकिन रज़ा तो जैसे पत्थर का बुत था, जिसे सिर्फ अपना पेट भरना आता था। उसे ना तो सकीना बाजी के जले हुए हाथ दिखते, ना अम्माँ की झुकती हुई कमर। वो दालान में बैठ कर डकार लेता और सकीना बाजी की तरफ एक सरसरी निगाह डाले बिना ही कमरे में चला जाता। छह महीने बीत गए। रज़ा भाई का इम्तिहान खत्म हो गया। जिस दिन उनका रिज़ल्ट आने वाला था, अम्माँ ने मन्नत का रोज़ा रखा। सकीना बाजी ने भोर से ही उठकर शीर-खुरमा बनाना शुरू कर दिया। दोपहर ढलते-ढलते रज़ा भाई घर लौटे। उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान थी। “पास हो गया मैं अम्माँ! अब तो सरकारी नौकरी पक्की समझो।” घर में जैसे ईद आ गई। अम्माँ ने झट से शीर-खुरमे का प्याला उनके आगे किया। रज़ा भाई ने दो चम्मच खाए और फिर अचानक अपना बैग समेटने लगे। “अरे, इतनी जल्दी क्या है बेटा? कुछ दिन और रुक जाओ।” अम्माँ ने उम्मीद से कहा, उनकी नज़रें रज़ा के मुँह से कोई और शब्द सुनने को बेताब थीं। “नहीं अम्माँ, आज ही की ट्रेन से वापस जाना है। वालिद साहब ने मेरे लिए एक रिश्ता तय किया है। लड़की वालों के पास शहर में दो मकान हैं। अगले जुम्मे को निकाह है, आपको भी कार्ड भिजवा दूँगा।” जैसे किसी ने एक झटके में अम्माँ के सीने से उनका दिल खींच लिया हो। शीर-खुरमे का प्याला मेरे हाथों से छूट कर ज़मीन पर गिरा और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए। मैंने पलट कर सकीना बाजी की तरफ देखा। वो दरवाज़े की ओट में खड़ी थीं। उनके चेहरे का रंग ऐसे उड़ गया था जैसे किसी ने जिस्म का सारा खून निचोड़ लिया हो। वो कुछ नहीं बोलीं, बस चुपचाप वापस चूल्हे की तरफ मुड़ गईं और बची हुई लकड़ियों पर राख डालने लगीं। रज़ा चला गया। पीछे छोड़ गया एक ऐसा सन्नाटा जो मौत से भी भारी था। उस दिन के बाद सकीना बाजी ने कभी अड़्डे की तरफ आँख उठाकर नहीं देखा। वो बीमार पड़ गईं। वह खाँसी, जो चूल्हे के धुएँ से शुरू हुई थी, अब सीने में बैठ चुकी थी। कई बार रात के अँधेरे में मैं उन्हें उस लाल रेशम के जोड़े को छाती से लगाकर सूखी और बेआवाज़ सिसकियाँ लेते सुनती। डॉक्टर आए, हकीमों की पुड़िया आई, टीन के बक्से में रखे वो बचे-खुचे सिक्के भी दवाइयों में उड़ गए, लेकिन सकीना बाजी की साँसें उखड़ने ही के लिए थीं। उन्होंने जैसे जीने का इरादा ही छोड़ दिया था। एक सर्द रात में, जब मोहल्ले के कुत्ते दूर कहीं रो रहे थे, सकीना बाजी की खाँसी अचानक रुक गई। हमेशा के लिए। सुबह हुई। आँगन में फिर से चटाई बिछी। मोहल्ले की औरतें फिर जुटीं, पर आज कोई कानाफूसी नहीं थी। बस एक मनहूस खामोशी थी। अम्माँ पत्थर सी बैठी थीं, उनकी आँखों से एक आँसू भी नहीं गिर रहा था। सफेद लट्ठा मँगाया गया। कफ़न की नाप ली जाने लगी। तभी अम्माँ उठीं। वो लड़खड़ाते कदमों से उस पुराने टीन के बक्से तक गईं और उसमें से वो लाल सुर्ख रेशम का जोड़ा निकाला, जिस पर उन्होंने रात-रात भर जागकर सितारे टाँके थे। उन्होंने सफेद कफ़न के ऊपर उस लाल जोड़े को फैला दिया। ज़री के तार धूप में चमक उठे, जैसे वो सकीना बाजी के वो सारे अधूरे अरमान हों जो कभी जुबान तक ना आ सके। औरतों में एक फुसफुसाहट दौड़ी, “अरी, ये तो सुहाग का जोड़ा है, इसे कफ़न पर क्यों डाल रही है?” अम्माँ ने एक ठंडी, बेजान नज़र उन पर डाली और अपने काँपते हाथों से जोड़े का आखिरी धागा कैंची से काटते हुए बोलीं, “मेरी बची की रुख़सती है आज... देखो, मेरा लाल जोड़ा बिल्कुल नाप का उतरा है।” और तब, पहली बार, उस लाल रेशम पर अम्माँ की आँखों से दो मोटे-मोटे आँसू गिरे, और हमेशा के लिए उस ज़री के तारों में जज़्ब हो गए।
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