APNIDIARY / STORY

वजूद की राख

By Apni Diary · September 22, 2026
सिकंदर भइया की जब शादी हुई, तो रूही भाभी की उम्र बमुश्किल सोलह बरस रही होगी। वो बिल्कुल किसी कच्ची कली की तरह थीं—सहमी हुई, नाज़ुक, और ऐसी गोरी जैसे किसी ने दूध में गुलाब की पत्तियाँ पीस कर मिला दी हों। भइया उनसे पूरे बारह साल बड़े थे। सिकंदर भइया अपने नाम की तरह ही थे—मगरूर, अपनी सेहत और जिस्म के दीवाने, रोज़ सुबह जिम जाने वाले और शीशे के सामने खड़े होकर अपनी कसरती बाहों को निहारने वाले। शुरू के एक-दो साल तो सिकंदर भइया ने रूही भाभी को किसी नायाब खिलौने की तरह सजा कर रखा। मगर फिर घर-गृहस्थी और बच्चों की झड़ी ने भाभी को अपनी लपेट में ले लिया। चार साल के अंदर भाभी तीन बच्चों की माँ बन गईं। वो नाज़ुक सी लड़की, जिसकी सुराहीदार गर्दन और पतली कमर पर भइया कभी ग़ज़लें पढ़ते थे, अब बच्चों को दूध पिलाते, रात-रात भर जागते और रसोई में खटते हुए, एक थुलथुल, बेढब और उम्रदराज़ औरत में तब्दील हो गई थीं। सिकंदर भइया को मोटापे और फूहड़पन से सख़्त नफ़रत थी। वो अब भी सत्ताईस-अट्ठाईस के ही लगते थे—चौड़ा सीना, तराशा हुआ चेहरा और वही कुँआरों वाली बेफ़िक्री। और रूही भाभी? वो पच्चीस की उम्र में पैंतीस की लगने लगी थीं। उनके बालों से हमेशा दूध की उल्टी, लहसुन और हींग की महक आती। भइया अब उनसे कटने लगे थे। वो जब भी भाभी की तरफ देखते, उनकी आँखों में एक अजीब सी घिन तैर जाती। भाभी इस बेरुखी को समझती थीं। उनकी आँखों में पलने वाला वो हिरनी जैसा खौफ़ अब एक स्थायी मायूसी में बदल गया था। वो भइया को खुश करने के लिए ना जाने क्या-क्या जतन करतीं—कभी उनके पसंद के मुर्ग़ मुसल्लम बनातीं, तो कभी उनके कपड़ों पर इस्तरी करते हुए चुपचाप रोतीं। मगर भइया के दिल का रास्ता अब उनके पेट से नहीं जाता था। भाभी ने अपने इस अकेलेपन और डर को छिपाने के लिए खाने का सहारा ले लिया। वो हर वक़्त कुछ न कुछ खाती रहतीं। तनाव उन्हें अंदर से खोखला कर रहा था, और वो उस खोखलेपन को क्रीम, मिठाइयों और घी से भरने की नाकाम कोशिश करतीं। और फिर हमारे घर में ज़ोया की एंट्री हुई। ज़ोया, भइया के ऑफिस की नई इंटीरियर डिज़ाइनर थी। वो रूही भाभी की बिल्कुल ज़िद थी। छरहरा बदन, कंधे तक कटे हुए सिल्की बाल, आँखों में तीखा काजल और होठों पर हमेशा एक आत्मविश्वासी, बल्कि थोड़ी मगरूर सी मुस्कान। वो जब भइया के साथ हमारे लॉन में बैठकर ब्लैंक कॉफ़ी पीती और सिगरेट के धुएँ के छल्ले उड़ाती, तो भइया उसे मंत्रमुग्ध होकर देखते। ज़ोया घंटों भइया से राजनीति, आर्ट और फ़िल्मों पर बहस करती। रूही भाभी उस वक़्त रसोई की खिड़की से इस नज़ारे को देखतीं। उनके हाथों में आटे का पलेथन लगा होता और आँखें आँसुओं से डबडबाई होतीं। एक दिन मैंने ज़ोया को भाभी की तरफ देखकर भइया से फुसफुसाते सुना था, "सिकंदर, तुम इस डोमेस्टिक गाय के साथ कैसे रह लेते हो? आई मीन... शी इज़ सो डल। ना कोई एम्बिशन, ना कोई ग्रेस।" भइया ने जवाब में सिर्फ़ एक ठंडी आह भरी थी, जैसे वो दुनिया के सबसे बड़े शहादत के मक़ाम पर खड़े हों। ज़ोया की कशिश ने भइया को पूरी तरह अंधा कर दिया था। घर में रोज़ कलेश होने लगे। रूही भाभी, जो कभी भइया के सामने आँख नहीं उठाती थीं, अब अपने वजूद की भीख माँगने लगी थीं। एक रात उन्होंने भइया के पैर पकड़ लिए, "मुझे छोड़ कर मत जाइए। मैं आपके पाँव की जूती बन कर रह लूँगी, बस मेरे बच्चों के सर से बाप का साया मत छीनिए।" मगर सिकंदर भइया तो जैसे पत्थर के हो चुके थे। उन्होंने बड़ी बेरहमी से भाभी के काँपते हाथों को झटक दिया। "तुमने अपना हाल देखा है रूही? तुम मेरे साथ खड़ी हुई मेरी बीवी कम, बच्चों की दाई ज़्यादा लगती हो। मुझे घुटन होती है इस रिश्ते में।" तलाक हो गया। रूही भाभी अपने बच्चों को लेकर अपने मायके चली गईं, और सिकंदर भइया ने ज़ोया से शादी कर ली। ज़ोया की आँखों में एक जीत का गुरूर था। उसे लगता था कि उसने सिकंदर को 'बदल' दिया है, कि वो उस पुरानी, गँवार बीवी से लाख दर्जे बेहतर है और सिकंदर सिर्फ और सिर्फ उसका है। इस वाकये को छह साल बीत गए। वक़्त की आँधी ने बहुत कुछ उड़ा दिया। मेरा भी ब्याह हो गया और मैं शहर से दूर चली गई। इन सालों में भइया और ज़ोया की कोई खास खबर नहीं मिली, सिवाय इसके कि भइया का बिज़नेस अब और भी फैल गया था। पिछले महीने, दिल्ली के एक बड़े होटल में एक आर्ट एक्ज़िबिशन के दौरान मेरी नज़र अचानक सिकंदर भइया पर पड़ी। वो अब भी वैसे ही थे—बल्कि कनपटियों पर सफ़ेद बालों की हल्की सी चमक ने उन्हें और भी ज़्यादा रौबदार और आकर्षक बना दिया था। वो एक पेंटिंग के सामने खड़े थे, और उनके साथ एक बेहद खूबसूरत, बीस-बाइस साल की कमसिन लड़की खड़ी थी, जो उन्हें बड़े मुग्ध भाव से पेंटिंग की बारीकियां समझा रही थी। मैं ज़ोया भाभी को ढूँढने लगी। वो बेबाक, छरहरी, हवाओं में उड़ती ज़ोया... अचानक मेरी नज़र कमरे के एक कोने में सोफे पर बैठी एक महिला पर पड़ी। मेरा दिल धक से रह गया। क्या वो ज़ोया थी? उसका जिस्म बेतरतीब तरीके से फैल चुका था। महँगी सिल्क की साड़ी भी उसके पेट की सिलवटों को छिपा नहीं पा रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी सूजन थी, और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे। वो बेचैनी से अपने हाथों की उँगलियाँ चटका रही थी और उसकी नज़रें लगातार सिकंदर भइया और उस नई लड़की पर गड़ी थीं। उसके चेहरे पर बिल्कुल वही खौफ़, वही बेबसी और वही असुरक्षा थी, जो कभी रूही भाभी के चेहरे पर हुआ करती थी। मैं उसके पास गई। "ज़ोया भाभी?" उन्होंने चौंक कर मुझे देखा। उनकी आँखों में मुझे पहचानने की चमक तो आई, लेकिन उसके साथ ही एक गहरी शर्मिंदगी भी तैर गई। "तुम... कैसी हो?" उनकी आवाज़ में वो खनक नहीं थी। वो एक बुझी हुई राख जैसी लग रही थीं। इतने में वेटर डेज़र्ट की ट्रे लेकर गुज़रा। ज़ोया ने काँपते हाथों से चॉकलेट मूस का एक बड़ा सा कटोरा उठा लिया और बड़े-बड़े चम्मच भरकर उसे मुँह में ठूँसने लगीं, जैसे वो उस मिठास से अपने अंदर के कड़वे ज़हर को दबाना चाह रही हों। ठीक वैसे ही, जैसे रूही भाभी जर्दा और क्रीम खाया करती थीं। मैंने पलट कर सिकंदर भइया को देखा। वो उस कमसिन आर्टिस्ट के बहुत करीब खड़े मुस्कुरा रहे थे। उनके चेहरे पर वही पुरानी, शिकारी जैसी चमक थी। और तब मुझे समझ में आया। सिकंदर भइया वक़्त की मार से अछूती वो **ज़ालिम चट्टान** थे, जिस पर आकर औरतें अपनी जवानी, अपनी खूबसूरती और अपना वजूद एक लहर की तरह दे मारती थीं। लहरें पूरी ताकत से आती थीं, ये सोचकर कि वो चट्टान को अपने आगोश में ले लेंगी, उसे बदल देंगी। मगर चट्टान कभी नहीं पिघलती। वो बस उस लहर के गुरूर को तोड़ कर उसे झाग में तब्दील कर देती है। रूही भाभी एक लहर थीं, जो टूट कर बिखर गईं। ज़ोया भी एक लहर थी, जो गुरूर से उठी, मगर इस चट्टान से टकरा कर अब अपना वजूद खो चुकी थी, और दर्द के बोझ तले सिसक रही थी। और वो नई कमसिन आर्टिस्ट? वो समंदर से उठती हुई एक नई लहर थी... जिसे अभी चट्टान के सीने से टकराकर चूर-चूर होना बाकी था। सिकंदर भइया, हमेशा की तरह, अपनी जगह पर अटल खड़े, एक नई लहर के टूटने का इंतज़ार कर रहे थे।
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